Tuesday, December 30, 2014

Fentency मेरी गरम जवानी

Fentency


मेरी गरम जवानी

मैं तो एक धनवान और एक व्यस्त व्यापारी की पैसे वाले बाप की बेटी थी। मेरे पास स्वयं की बहुत पूंजी थी। परन्तु मेरे पति अनिरुद्ध एक अध्यापक थे, एक साधारण व्यक्ति थे। रात के दस बजे तक वे ट्यूशन करते थे। हमारा प्रेम विवाह था, स्वयं की जिद थी सो पिता ने हार कर विवाह करवा दिया था। उनका दैनिक कार्यक्रम बहुत ही टाईट था, उनके पास किसी भी काम के लिये समय नहीं था। अक्सर रात को ट्यूशन के बाद थक कर वो तीन चार पेग दारू पी कर गहरी नींद में सो जाया करते थे। मैं भी उनकी व्यस्तता समझती थी।

जुलाई का महीना था। उन्ही दिनों उनका भाई राजू बी ए करके हमारे पास ही आ गया था। मेरी चुदाई में मेरे पति अब अधिक रुचि नहीं दर्शाया करते थे। पर जवानी का तकाजा है चुदना ... बिना चुदाई के मेरी मदमस्त जवानी तड़पने लगी थी। फिर मेरी जैसी आदत थी कि मुझे आराम अधिक पसन्द था। खालीपन में मेरे दिमाग में बस सेक्स की बातें ही अधिक आया करती थी। पैसा अधिक होना भी अय्याशी का एक कारण होता है। अधिकतर तो मेरी नजर तो अब हर किसी लड़के के पैंट के अन्दर लण्ड तलाशती रहती थी। राजू के यहाँ आने के बाद मेरी अय्याश नजरें राजू की ओर उठने लगी थी।

वो एक मस्त भरपूर जवान लड़का था। जब वो रात को पजामा पहनता था तो उसके मस्त चूतड़ की गोलाइयां मेरे दिल को छू जाती थी। उसके लण्ड के उभार की झलक मेरे मन में वासना का गुबार भर देती थी। उसे देख कर मैं मन मसोस कर रह जाती थी। जाने कब वो दिन आयेगा जब मेरी मन की मुराद पूरी होगी। मुझे पता था कि मेरे पड़ोस की लड़की सरिता को वो मन ही मन चाहता था। वो सरिता ही मेरा जरिया बनी।

मेरे मन में सरिता और राजू को मिलवाने की बात समझ में आने लगी।
"राजू, सरिता तुझे पूछ रही थी, क्या बात है?"
"सच भाभी, वो मुझे पूछ रही थी, क्या कह रही थी?"
"आय हाय, बड़ी तड़प उठ रही है, मिलेगा उससे?"
"बस एक बार मिलवा दो ना, फिर जो आप कहेंगी मै आप के लिये करूंगा !"
"सोच ले, जो मै कहूंगी, फिर करना ही पड़ेगा ..." मै हंसने लगी।

फिर मैंने राजू को पटाने के लिये उसे मैंने सरिता से मिलवा दिया। उसके घर आते ही मैंने सरिता से भी यही बात कही तो वो शरमा गई। सरिता एक तेज किस्म की चालू टाईप की लड़की थी। उसके कितने ही आशिक थे, मेरी तरह वो भी जाने कितनी बार अब तक चुद चुकी थी। सरिता के ही कहने पर मैंने उसे और राजू को मेरे बगल वाले कमरे में बातें करने की आज्ञा दे दी। मुझे पता था कि वो बातें क्या करेंगे, बल्कि अन्दर घुसते ही चुदाई के प्रयत्न में लग जायेंगे।

...और हुआ भी यही ! मैं चुपके से उन्हें देखती रही। वे दोनों भावावेश में एक दूसरे से लिपट गये थे। फिर कुछ ही देर में चूमा चाटी का दौर चल पड़ा था। सरिता के वक्ष स्थल पर राजू ने कब्जा कर लिया था और कपड़े के ऊपर से ही उसके उभारों को मसल रहा था। सरिता के हाथ भी राजू के लण्ड को पकड़ चुके थे।

मुझे लगा कि इसके आगे तो सरिता चुद जायेगी, और एक बार राजू ने उसे चोद दिया तो उनके रास्ते खुल जायेंगे फिर तो वे दोनों कहीं भी चुदाई कर लेंगे।

मैंने दरवाजे पर दस्तक देकर उन्हें रोक दिया।
सरिता ने दरवाजा खोला, उसके वासना से भरे गुलाबी आँखों के डोरे सब कुछ बयान कर रहे थे।
"मिल लिये अब बस, अब कल मिलना !"
सरिता के नयन झुक गये। उसने अपने कपड़े ठीक किये बालों को सेट किया और बाहर आ गई।
"राजू, अब बाहर भी आ जाओ !"
"भाभी अभी नहीं, रुको तो !"
सरिता ने मुझे शरमा कर देखा और जल्दी से बाहर निकल गई। मैं राजू को देखने के लिये कमरे में घुस गई। उसका लण्ड तन्नाया हुआ था। मुझे देखते ही वो जल्दी से घूम गया।
"क्या छिपा रहे हो राजू? मुझे भी तो बताओ !"
"कुछ नहीं भाभी, आप जाओ..."
"ऊ हुं ... पहले बताओ तो ..." मैंने जान कर के उसके सामने आ गई।
"उई मां ... राजू ये क्या !!!" और मैं जोर से हंस पड़ी।
उसने शरम के मारे अपने दोनों हाथ लण्ड के आगे रख दिये और उसे छिपाने की कोशिश करने लगा।
"मजा आया ना सरिता के साथ ... ऐ ! क्या क्या किया ... बता ना?"
"कुछ नहीं किया भाभी..."
"वो तो, तुम्हारे हाव भाव से पता चल चल रहा है कि क्या किया ... उसे मजा आया?"
उसने अचानक मुझे कंधों से पकड़ लिया और अपनी ओर खींच लिया।
"अरे यह क्या कर रहा है... छोड़ दे ... देख लग जायेगी।"
उसकी सांसें तेज हो गई थी, उसका दिल तेजी से धड़कने लगा था। उसने मुझे कस कर जकड़ लिया। मुझे उसका सीधे आक्रमण करना बहुत अच्छा लगा।
"बस भाभी, कुछ ना बोलो ... मुझे करने दो..." वो लगभग हांफ़ता हुआ बोला।
मुझे और क्या चाहिये था ! मैं उसकी बाहों में ना ना करते हुये समाने लगी। मेरी कल्पनायें साकार सी होती लगी। अब तो उसके कड़क लण्ड का स्पर्श भी मेरी चूत के आसपास होने लगा था। तभी उसके हाथों ने मेरे सीने को दबा दिया।

मेरे मुख से आह सी निकल गई। मेरे मन में उसका लण्ड थामने की इच्छा होने लगी। तभी वो झटके से अलग हो गया।
"ओह भाभी ... मैं यह क्या करने लगा था ... मुझे माफ़ कर देना !"
"एक तो शरारत की... फिर माफ़ी ... बड़े भोले बनते हो..." मैंने कातर स्वर में कटाक्ष किया।
वो सर झुका कर हंस दिया। ओह ... हंसा तो फ़ंसा ! अब कोई नहीं रोक सकता मुझे ... समझो उसके मस्ताने लण्ड का मजा मुझे मिलने ही वाला है।
सरिता को चोदने की आशा में मैंने उसे फ़ंसा लिया था, अब तो सरिता गई भाड़ में ! कमबख्त को घर में घुसने ही नहीं दूंगी।

शाम को पतिदेव जब दारू पी कर खर्राटे भरने लगे। बाहर मौसम बहुत सुहावना हो रहा था, बादल गरज रहे थे, लगता था कि तेज बरसात होने वाली है।

ठण्डी हवा चलने लगी थी। रात भी गहरा गई थी, मन का मयूर कुछ करने को बेताब हो रहा था। तो मेरे मन में वासना का शैतान बलवान होने लगा। मैंने पति को झकझोर के उठाने की कोशिश की पर वो तो जैसे दारू की मदहोशी में किसी दूसरी दुनिया में खो चुके थे। मैंने जल्दी से एक दरी ली और छलांगें मारती हुई छत पर आ गई।

उफ़्फ़, कितनी ठण्डी बयार चल रही थी। तभी राजू ने मुझे आवाज लगाई। मैंने नीचे झांक कर देखा फिर कहा- ऊपर आ जाओ मस्त मौसम है।

वो पजामा पहने हुए था। वो भी छत पर आ गया। हवायें तेज चलने लगी थी। मुझे लगा कि राजू की नीयत मुझे देख कर डोल रही है। पजामे में उसका लण्ड खड़ा हुआ था। वो बार बार उसे मसल रहा था। मुझे लगा लोहा गरम है और यही गरम गरम लोहा मेरी चूत में उतर जाये तो अन्दर का माल पिघल कर बाहर आने में देरी नहीं करेगा। वो मुझे टकटकी लगा कर देख रहा था।

"क्या हो रहा है देवर जी ... किसकी याद आ रही है?"
"जी, कोई नहीं ... मैं तो बस..."
"होता है जी, जवानी में ऐसा ही होता है ... सरिता की याद आ रही है ना?"
मैं उसके काफ़ी नजदीक आ गई और उसकी बांह पकड़ ली। तभी जोर की बिजली तड़की।
मैं जान कर सहम कर उससे जा चिपकी।
"हाय रे, कितनी जोर से बिजली चमक रही है।"

उसने भी मौका देखा और मुझे जोर से जकड़ लिया। मैंने नजरें उठा कर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में वासना के लाल डोरे उभरे हुये थे। मैंने उसे और उतावला करने के लिये उसे धीरे से दूर कर दिया।
सरिता को बुला दूँ क्या...?
"ओह भाभी, इतनी रात को वो कैसे आयेगी।"
मैंने छत पर दरी बिछा दी और उस पर लेट गई- अच्छा दिन में उसके साथ क्या क्या किया था। देखो साफ़ साफ़ बताना...।
"वो तो भाभी मैंने उसे...!"
"चूम लिया था... है ना... फिर उसकी छाती पर आपकी नजर पड़ी..."
तभी बरसात की हल्की हल्की बूंदें गिरने लगी। मैं तो मात्र पेटीकोट और ब्लाऊज में थी, भीगने सी लगी।
"आपको कैसे पता... जरूर आपने छुप कर देखा था..."
"ऊंह ... जवानी में तो यही होता है ना..."
बरसात धीमी होने लगी थी। मैं भीगने लगी थी।
"भाभी उठो ... नीचे चलते हैं।"
तभी बिजली जोर की चमकी और एकाएक तेज बरसात शुरू हो गई। मैंने अपने हाथ और पांव फ़ैला दिये।
"देवर जी, तन में आग लगी हुई है... बदन जल रहा है... बरसात और तेज होने दो..."
मैंने देवर का हाथ जोर से पकड़ लिया। वो भी भीगता हुआ मुझे देखने लगा। उसने एक हाथ से अचानक मेरे गाल सहला दिये। जाने क्या हुआ कि उसके होंठ मुझ पर झुकते गये... मेरी आँखें बन्द होती गई। हम दोनों के हाथ एक दूसरे पर कसने लगे। उसके लण्ड का उभार अब मेरी चूत पर गड़ने लगा था। उसके हाथ मेरे चूतड़ों पर आ गये थे और गोलों को धीरे धीरे सहलाने लगे थे।
पानी से तर बेसुध होकर मैं तड़प उठी।
"देवर जी, बस अब छोड़ दो !" 
"भाभी, ऐसा ना कहो ... मेरे दिल में भी आग लग गई है।"
"देख ना कर ऐसा ! मैं तुझे सरिता से भी जोरदार लड़कियों से दोस्ती करा दूँगी, उनके साथ तू चाहे जो करना, पर अब हट जा।"
"पर भाभी आप जैसी कहाँ से लाऊँगा !"
उसकी बातें मुझे घायल किये दे रही थी। मेरी योनि भी अब चुदने के खुल चुकी थी। मुझे अहसास हो रहा था कि उसमें से अब पानी निकलने लगा है।
"राजू, प्लीज, अच्छा अपनी आँखें बन्द कर ले और दरी पर लेट जा !" मेरे मन में चुदने की इच्छा बलवती होने लगी। उसने मेरी बात झट से मान ली और वो दरी पर सीधा लेट गया। मैंने उसके खड़े लण्ड को चड्डी के ऊपर से निहारा और उसकी चड्डी धीरे से नीचे उतार दी। उसका तन्नाया हुआ लण्ड झूमता हुआ मेरी आँखों के सामने लहरा गया। उसका अधखुला लाल सुपारा मुझे घायल कर रहा था।
"भाभी, क्या कर रही हो, देखो फिर मुझसे रहा नहीं जायेगा।"
बरसात जोर पकड़ चुकी थी, बादलों की गड़गड़ाहट से मेरा दिल भी लरजने लगा था।
"तो क्या कर लेगा, बोल तो जरा...?"
"देखो भाभी, बस करो वर्ना मैं आपको चोद ..."
"हाय रे ! हाँ हाँ, बोल दे ना... तुझे मेरी कसम... क्या कह रहा था? " मैंने उसका उफ़नता लण्ड पकड़ लिया। आह ! गरम, कड़क लोहे जैसा ! मेरा दिल मचल उठा।
मैंने अपना पेटीकोट ऊपर उठा लिया और अपनी गीली चूत को उसके अधखिले सुपारे पर रख दिया। मेरी चूत में एक तेज मीठी सी गुदगुदी हुई और उसका लण्ड मेरी चूत में समाता चला गया। तभी गर्जन के साथ बिजली तड़क उठी। हवा भी तेज हो गई थी। साथ ही राजू का सबर भी टूट गया और उसने मुझे दबा कर पलटी मार दी।
अब वो मेरे ऊपर था। उसका भार मेरे शरीर पर बढ़ता चला गया, उसका मस्त लौड़ा मेरी चूत को चीरता हुआ पैंदे तक बैठ गया।
मैंने चूत का और जोर लगा कर उसे जड़ तक गड़ा दिया। दोनों के जिस्म तड़प उठे।
उसके जबरदस्त धक्कों से मैं निहाल हो उठी। मेरा बदन इस तूफ़ानी रात में जैसे जल कर आग होने लगा। राजू अपनी आंखें बन्द किये मुझे झटके दे देकर चोदे जा रहा था।
तभी वासना की अधिकता से मैं जल्दी ही चरम सीमा पर पहुंच गई और मेरे जिस्म ने अकड़ कर अपना रज छोड़ दिया। राजू की तड़प भी जल्दी ही सीमा को पार गई और उसके लण्ड ने पानी छोड़ दिया। हम दोनों जल्दी ही झड़ गये थे।
"देवर जी, चोद दिया ना अपनी भाभी को ..."
जोर की बरसात अभी भी दोनों को पागल किये दे रही थी। राजू मेरे से फिर एक बार और चिपक गया, फिर जाने कैसे एक बार और उसका लण्ड कड़क उठा और मेरे शरीर को फिर से भेदता हुआ चूत में उतर गया। मैं फिर से एक बार और चुदने लगी। फिर जैसे बरसात थम सी गई। हम दोनों निढाल से पास पास में लुढ़क गये।

फिर मैं उठी और राजू को भी उठाया। हम दोनों जल्दी जल्दी नीचे आये और नल के नीचे खड़े हो कर स्नान कर लिया। फिर मैंने अपने कपड़े सम्हाले और भाग कर अपने कमरे में चली आई। मैं पति की बगल में जाकर सो गई और उसे ध्यान से देखने लगी। मेरा ध्यान धीरे धीरे राजू पर आ गया और चुदाई के बारे में सोचने लगी।

सुबह मेरी नींद जरा देर से खुली। मुझे रात की घटना सपने जैसी लगी। उफ़ ! कैसी तूफ़ानी रात थी, क्या मैं सच में चुदी थी। पर मेरा भ्रम जल्दी ही टूट गया। मुझे यकीन हो गया था कि रात को मैं वास्तव में चुदी थी। राजू भी आज सर झुकाये शर्माता हुआ मुझसे छुपने की कोशिश कर रहा था। 
मुझे अब मालूम हो गया था कि राजू अब सरिता को नहीं बल्कि मुझे पसन्द करने लगा था। वो शाम को अपने गाँव जा रही थी पर राजू उसे छोड़ने नहीं गया था।

मैंने उसे कुछ नहीं कहा। शाम को भोजन करके मेरे पति तो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने बैठक में चले गये। उन्हें मौसम से कुछ लेना देना नहीं था। बाहर ठण्डी हवायें चल रही थी, बरसात होने को थी, सावन का महीना मन को गुदगुदा रहा था, ऐसे मौसम में भला कौन नहीं चुदना चाहेगा। मैंने राजू के कमरे में से उसे बुला लिया। उसके हाथ में तेल की बोतल थी। वो अपने शरीर की मालिश कर रहा था।
मैंने भी उसका हाथ पकड़ा और ब्लाऊज खोल कर तेल लगाने को कहा। उसने जल्दी से मेरी चूचियों पर तेल मल दिया। फिर मैंने उसका हाथ अपने पेटीकोट में डाल दिया।
"क्या कर रही हो भाभी...? भैया अन्दर हैं !"
"जल्दी कर !" मेरी सांस फ़ूलने लगी थी।
उसने जल्दी से मेरी गाण्ड पर तेल मल दिया और एक अंगुली को तेल लगा कर मेरी गाण्ड में भी पिरो दिया।

मैंने उसे खींचा और तीसरी मंजिल की छत पर आ गई। काली घटा अन्धेरे को और बढ़ा रही थी। मै तो राजू से अब खुल ही चुकी थी। उससे चुदने की चाह भी बढ़ने लगी। मैंने अपने ब्लाऊज को सामने से खोल दिया और अपनी नंगी छातियों को उघाड़ कर ठण्डी हवा का आनन्द लेने लगी। राजू मुझे बड़ी गहरी और वासना की नजर से घूर रहा था। तभी मैंने जोश में अपना पेटीकोट भी ऊंचा कर लिया और कमर तक उठा लिया। ठण्डी हवा नीचे मेरे तन में लगने लगी।
"भाभी, इसे नीचे कर लो..."
"क्या फ़रक पड़ता है, इतनी ऊंची दीवारें है, कोई नहीं देखेगा... तू भी पाजामे में से निकाल ले अपना लण्ड ... मजा लेकर देख..."
राजू ने अपने हाथ मेरे चूतड़ों की तरफ़ बढ़ा दिये और अब वह वहाँ पर सहलाने लगा था। मेरी गाण्ड तो वैसे भी चिकनी और चमकदार थी। तभी उसके हाथों में वही तेल की शीशी आ गई और मेरी चिकनी गाण्ड पर वो मलने लगा। मैंने उसे मतलबी निगाहों से देखा।
"कितनी चिकनी करेगा रे?"
मेरी गाण्ड को वो थपथपाता हुआ बोला,"भाभी, आप तो माल हो माल... मलाईदार माल..."
"ऐ, चुप ... मुझे माल कहता है..."
"सच भाभी ... तुम्हारा टाईट बदन, कठोर चूचियां ... मस्त चिकनी चूत और ये कठोर चूतड़ ... सरिता में ये सब कहां था..."
"ओह ... वो तो पचास लोगों से चुदवा चुकी है... मुझे तो वो एक मिला है वो भी हाथ ही नहीं लगाता है..." मैंने अपनी तारीफ़ खुद ही कर दी।
"मेरी भाभी ... बस ... आप तो अब मेरी हो गई... अब देखना आपको मैं कैसे बजाता हूँ..."
तभी उसका हाथ मेरे चूतड़ों की दरार में घुस गया और कुछ टटोलने लगा, मैं तो जैसे उछल ही पड़ी। उसकी एक अंगुली मेरी गाण्ड में घुस गई। अब वो उसे मेरी गाण्ड में घुमाने लगा। मेरी गोरी चिकनी गाण्ड में एक झुरझुरी सी आ गई।
"कर दी ना मेरी गाण्ड में अंगुली..."
उसने गाण्ड में हाथ मारते हुये कहा,"अभी तो देखो इसे कैसे मारता हूँ।"
"चल हट ... गाण्ड ऐसे थोड़े ही मारते हैं?"
"तो भाभी ... ऐसे ही तो मारते है ना?" मेरे चूतड़ पर हाथ मारते हुये वो बोला।
"उह... तुम तो अनाड़ी हो... जहां अंगुली डाली थी ना... वहाँ अपना लण्ड घुसेड़ दो तो गाण्ड मारना कहा जायेगा।"

"ऐ भाभी, मेरा लण्ड पकड़ ना ... मजा आता है, फिर इसे जहा आप चाहो वहाँ घुसेड़ लेना।"
मैंने उसका लण्ड पजामा नीचे करके पकड़ लिया। अन्धेरे में वो साफ़ नहीं दिखा पर बहुत कड़क हो रहा था। बून्दा-बांदी शुरु हो गई थी। मेरी पीठ पर पानी की बूंदें मीठी सी जलन पैदा कर रही थी। मैंने दीवार पर अपने दोनों हाथ लगा दिये और टांगें पसार दी। कुछ कुछ घोड़ी सी बन गई थी। मैंने उसे बड़ी आशा भरी निगाहों से देखा और मेरे देखते ही राजू जैसे सब कुछ समझ गया।
"क्या दीवार गिराने का इरादा है...?"
"राजू ... अब चल ना ...!"

वो मेरी पीठ से चिपक गया और उसने अपना लम्बा लण्ड मेरी गाण्ड पर दबा दिया। तेल भरी गाण्ड में लण्ड ऐसे फ़िसल गया जैसे कोई दरवाजा पहले से खुला हो। मेरे दिल में एक मीठी सी टीस उठी। ऐसा लगा कि कोई गरम लोहा मेरी गाण्ड में ठोक दिया हो।
"ऐ राजू, धीरे से, ये तो अभी कंवारी है, देख लग ना जाये !" यह कहानी आप मोबाइल पर पढ़ना चाहें तो एम डॉट अन्तर्वासना डॉट कॉंम पर पढ़ सकते हैं।
पर राजू तो जोश में था, लण्ड अन्दर ठूंसता चला गया, लण्ड भी सरसराता हुआ बेखौफ़ अन्दर उतरता चला गया।

"लव यू भाभी, कंवारी गाण्ड का मजा तो गजब का होता होगा !" उसने भी अपनी दोनों टांगें फ़ैला ली और मेरे चूतड़ों के बराबर आ गया। उसने अपना एक हाथ मेरी कमर में लपेटा और दूसरा हाथ मेरी भारी सी चूचियों पर रखा और मुझे यूँ दबा लिया जैसे कोई कसाई बकरे को दबा लेता है।
बरसात तेज हो चली थी। उसकी मोटी मोटी बूंदें तड़ तड़ सी मेरी पीठ पर लग रही थी। मुझे तभी ध्यान आया कि मैं तो पूरी नंगी हूँ, उसने जाने कब मेरा पेटीकोट उतार दिया था। ब्लाऊज तो मैंने स्वयं ही उतार दिया था। मुझे एकाएक शरम सी आने लगी थी। मेरी शरम छुपाने में मेरा साथ यह अंधेरा दे रहा था। मैं खुल कर गाण्ड मरवाने लगी। वो बड़ी अदा से अपने शरीर को मोड़ कर लगभग कुत्ते की स्टाईल में अपना लण्ड अन्दर-बाहर करके चोद रहा था। तड़पती हुई बिजलियाँ, राजू के भीगे हुए चमकते बदन को और चमका रही थी थी। हम दोनों ही बिल्कुल नंगे रति क्रिया में लगे हुये थे।
"गीली गीली भीगी हुई भाभी को चोदने में कितना मजा आ रहा है।"
"हाय राजू, बस ऐसे ही मुझे गीली करके चोदा कर, कितना आनन्द आ रहा है !"
"हाँ मेरी भाभी, तेल लगा कर गाण्ड चोदने में और भी मजा है ... "

उसकी बातों से मेरी उत्तेजना बढ़ने लगी। वो बीच बीच में मुझे रण्डी छिनाल जैसी उपाधियाँ भी देता जा रहा था। पर वो तो प्यार जाहिर करने का, मस्ती जाहिर करने का एक तरीका था। राजू मेरी पीठ से बुरी तरह से चिपका हुआ था।

उसकी रफ़्तार इंजन के पिस्टन की तरह थी। अचानक वो और नीचे झुका और मेरी पीठ को और दबा कर उसने लण्ड निकाल कर नीचे चूत की तरफ़ सरका दिया और मेरी
चूत पर उसे घिसने लगा। चूत पर लण्ड का घर्षण ने मुझे और मस्ती में ला दिया। तभी उसने उसने कमर से उठा कर नीचे गीली खुरदरी सी छत पर लेटा दिया और मेरी दोनों टांगों के बीच में समा गया। उसका उतावला कड़क लण्ड मेरी चूत को फिर से रगड़ रहा था।
"राजा ... घुसेड़ दे यार ... चोद दे अब जोर से..."
"भोसड़ी की, ये ले, अब खा ले मेरा लण्ड ... तेरी मां की भोसड़ी !"

और जोश में उसका लण्ड मेरी योनि को फ़ाड़ता हुआ सटाक से भीतर चला गया। मेरे अन्तःमन की ज्वाला भड़कने लगी थी... मैंने अपनी चूत को उठा कर उसके लण्ड पर दबा दिया। ठण्डे पानी की बौछारों ने और मस्ती का काम किया। तेज बरसात उस पर ऐसी चुदाई, हाय राम मर जाऊँ ... उसके करारे धक्के मेरी जान निकालने पर तुले थे। सारा शरीर वासना की ज्वाला से धधक रहा था। तेज बारिश हम दोनों पर आग में घी का काम कर रही थी। उसके सटासट तेज धक्कों से मेरा पूरा जिस्म हिल रहा था। मेरे सीने की बोटियाँ जैसे राजू नोच नोच कर खा जाना चाहता था।

मेरी वासना भारी चीखें बरसात और बादलों की गर्जन में दब कर रह जाती थी। धीरे धीरे मैं चरम सीमा की ओर बढ़ रही थी। सारा जिस्म जैसे फ़ड़क उठ था। सारा रस चूत की तरफ़ भाग रहा था। मेरी पकड़ मजबूत हो गई थी। मेरे जबड़े भिंच कर कठोर हो गये थे। दांत कस गये थे और किटकिटाने लगे थे। मैं चाह कर भी अपने आप को नहीं रोक पाई।

एक चीख के साथ चरमसीमा को मैंने लांघ लिया और जोर से स्खलित होने लगी।
मेरी चूत में लहरें चलने लगी और मैं तड़पती हुई राजू से लिपट गई। मेरी गरम जवानी ने राजू को भी झड़ने पर मजबूर कर दिया और उसका वीर्य जोर से निकल गया और मेरी योनि में भरने लगा। लम्बी लम्बी सांसें लेते हुए मैं निढाल सी हो गई। बादलों की तेज गर्जन और फिर छटपटाती बिजलियों को सुन कर मैं उठ कर बैठ गई। तभी मुझे लगा कि छत के खुरदरे फ़र्श से मेरी पीठ जगह जगह से खुरच गई थी, उसमें खरोंच के लाल लाल निशान पड़ गये थे। हल्की जलन सी होने लगी थी।

मैंने जल्दी से अपना भीगा पेटीकोट किसी तरह से अपने शरीर में फ़ंसा कर पहन लिया। गीले ब्लाऊज को जैसे तैसे मैंने अपने सीने के उभारों पर खींच खींच कर सेट कर लिया। राजू भी अपना पजामा और बनियान पहन कर खड़ा हो गया था। अब बरसात का पानी मुझे ठण्डा लगने लगा था।
हम दोनों छत से नीचे आ गये और स्नान करके फ़्रेश हो गये।

अभी दस बजने में पन्द्रह मिनट शेष थे, अभी भी मेरे पति छात्रों को पढ़ाने में लगे थे।
राजू हमारे साथ बहुत दिनों तक रहा था... इस दौरान हम दोनों ने जवानी का आनन्द जी भर कर लूटा था। फिर एक दिन आया, राजू की नौकरी किसी अन्य शहर में लग गई और हम दोनो एक दूसरे से बिछुड़ गये !

इस जवानी के मद भरे रिश्ते के बाद मैंने कभी किसी अन्य पुरुष से सम्पर्क नहीं किया... बस अपने पति की होकर रह गई।
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